Navratri Vrat Katha

नवरात्री व्रत कथा(Navratri Vrat Katha) का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है | व्रत की विधि इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं है प्रातः उठकर स्नान करके मंदिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान वह व्रत रखना चाहिए कन्याओं के लिए यह विशेष फलदायक है श्री जगदंबा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं कथा के अंत में बारंबार दुर्गा माता तेरी सदा ही जय का उच्चारण करें |

श्री नवरात्र व्रत कथा navratri vrat katha

Navratri Vrat Katha

कथा प्रारंभ-बृहस्पति जी बोले हे ,ब्राह्मण आप अत्यंत बुद्धिमान सर्व शास्त्रों और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो हे प्रभु कृपया कर मेरा वचन सुनो चैत्र आसीवन माघ और आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है हे ,भगवान इस वक्त का क्या फल है किस प्रकार करना उचित है ,और पहले इस व्रत को किसने किया |(Navratri Vrat Katha)

विस्तारपूर्वक कहो बृहस्पति जी का ऐसा भजन सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पति प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा महादेव सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं यह मनुष्य धन्य है यह नवरात्र व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र धन चाहने वालों को धन विद्या चाहने वालों को विद्या तथा सुख चाहने वालों को सुख मिल सकता है |नवरात्री व्रत कथा(Navratri Vrat Katha)

इस व्रत के करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार में बंद हुआ मनुष्य बंधन से छूट जाता है मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती है और उसके घर में संपूर्ण संपत्ति आकर उपस्थित हो जाती है बंध्या और कांक बंधा के इस व्रत के करने से पुत्र पैदा हो जाता है समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन सा मनोरथ है |नवरात्री व्रत कथा

जो सिद्ध नहीं हो सकता जो प्राणी इस अद्भुत मनुष्य देह को पा कर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता और पिता से हीन हो जाता है अर्थात उसके माता पिता मर जाते हैं अनेक दुखों को भोगता है उसके शरीर में कुष्ठ रोग हो जाता है और वह अंग ही न हो जाता है उसके संतानोत्पत्ति नहीं होती इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुखों को बोलता है इस व्रत को न करने वाला निर्दई मनुष्य धन और धान्य रहित होकर भूख और प्यास के मारे तिरछी पर घूमता फिरता है और गूंगा हो जाता है |नवरात्री व्रत कथा(Navratri Vrat Katha)

जो सद्व स्त्री इस व्रत को नहीं करती वह पति हीन होकर नाना प्रकार के दुखों को बोलती है यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन उपवास न रख सके तो एक समय भोजन करें वह उस दिन बांधव सहित नवरात्र व्रत कथा करें हे बृहस्पति जिसने इस महावत को किया उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं तुम सावधान होकर सुनो इस प्रकार ब्रह्मा जी का वचन सुन कर बृहस्पति बोले हे ब्राह्मण मनुष्यों का कल्याण करने वाले इस वर्ष के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं आपकी शरण आए हुए मुझ पर कृपा करो ब्रह्माजी बोले पीठ नामक मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था |नवरात्री व्रत कथा

उसके संपूर्ण सद्गुणों से युक्त मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुनती नाम की एक अत्यंत सुंदरी पुत्री पैदा हुई वह कन्या सुनती अपने पिता के घर बालक पन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीडा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी कि जैसे शुक्ल पक्ष की कला बढ़ती है उसका पिता प्रतिदिन जब दुर्गा की पूजा और होम किया करता था उस समय वह भी नियम से वहां पर उपस्थित होती थी |नवरात्री व्रत कथा(Navratri Vrat Katha)

एक दिन सुनती अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि है दुष्ट पुत्री आज प्रभात से तूने भगवती का पूजन नहीं किया इस कारण मैं किसी कुश्ती और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा इस प्रकार पिता का वचन सुनकर सुनती को बड़ा दुख हुआ पिता से कहने लगी यह पिता जी मैं आपकी कन्या हूं मैं आपके सब तरह से आधीन हूं आपकी जैसी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो पर होगा वही जो मेरे भाग्य में विधाता ने लिखा है |नवरात्री व्रत कथा

मेरा तो इसी पर पूर्ण विश्वास है मनुष्य न जाने कितने मनोरथ का चिंतन करता है पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है जो जैसा कार्य करता है उसको फल भी उसी कर्म के अनुसार ही मिलता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के अधीन है पर फल देव के अधीन है जैसे अग्नि में पड़े हुए थे ना दी उसको अधिक प्रति पद कर देते हैं उसी प्रकार अपने कन्या से ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को और अधिक क्रोध आया तब उसने अपनी कन्या का एक कुस्टी के साथ विवाह कर दिया |नवरात्री व्रत कथा

और अत्यंत क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा जाओ जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल होगा देखे भला भाग्य के भरोसे रह कर क्या करती है इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमती में मन में विचार करने लगी की आंखों मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला है |

अपने दुख का विचार करती हुई वह सुमती अपने पति के साथ वन में चली गई और भ्यावने कुशा उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी की हे दीन ब्राह्मणी मैं तुम पर प्रसन्न हूं तुम जो चाहो सो वरदान मांग सकती हो मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं |नवरात्री व्रत कथा

इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हो जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन दासी को कृतार्थ करो ऐसा ब्राह्मणी का वजन सुनकर देवी कहने लगी कि मैं आदिशक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मा विद्या और सरस्वती हूं मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं हे ब्राह्मणी मैं तुम पर तेरे पूरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं तेरे पूर्व जन्म के वितांत सुनाती हूं सुनो टू पूर्व जन्म में निषाद की स्त्री थी और अति पतिवर्ता थी |(Navratri Vrat Katha)

एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेल खाने में कैद कर दिया उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने ने तो कुछ खाया और ना ही जल पिया इसलिए 9 दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया यह ब्राह्मणों दिनों में जो व्रत हुआ |(Navratri Vrat Katha)

उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनोवांछित वस्तु दे रही हूं तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्मणी बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न है तो हे दुर्गे मैं आपको प्रणाम करती हूं कृपया कर मेरे पति के कोढ को दूर करो देवी कहने लगी उन दिनों में जो तुमने ही व्रत किया उस वक्त के 1 दिन का पुण्य तुम्हारे पति का कोढ़ दूर करने को अर्पण करो मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जाएगा ब्रह्मा जी बोले कि ,इस प्रकार देवी के वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है |

ऐसे बोली तब उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुस्त हीन होकर अति क्रांति युक्त हो गया जिस की क्रांति के सामने चंद्रमा की क्रांति भी हीन हो जाती है वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति प्रक्रम वाली समझकर स्तुति करने लगी हे दुर्गे आप दुर्गति को दूर करने वाली तीनों जगत का संताप हरने वाली समस्त दुखों को दूर करने वाली |

रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली प्रसन्न होने पर मन वांछित वस्तु देने वाली और दुष्ट मनुष्यों का नाश करने वाली हो तो नहीं सारे जगत की माता और पिता हो तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो हे अंबे मुझ अपराध रही तबला को मेरे पिता ने कुश्ती मनुष्य के साथ विवाह कर घर से निकाल दिया था उनके निकाली हुई पृथ्वी पर घूमने लगी आपने ही मेरा इस आपत्ति रूपी समुंद्र से उद्धार किया है यह देवी मैं आपको प्रणाम करती हूं ब्रह्मा जी बोले कि है बृहस्पति इसी प्रकार उसने मन से देवी की बहुत स्तुति की |(Navratri Vrat Katha)

सुमति पर देवी को बहुत संतोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी यह ब्राह्मणी तेरे उद्दालक नाम का अति बुद्धिमान धनवान कीर्तिमान और जितेंद्र पुत्र शीघ्र ही होगा ऐसा कह कर वह देवी उस ब्राह्मणी से कहने लगी कि यह ब्राह्मण जो और कुछ तेरी इच्छा हो वह मन वांछित वस्तु मांग सकती हो ऐसा भवानी दुर्गा का वचन सुनकर सुमति कहने लगी कि हे दुर्गे अगर आप मुझ पर प्रसन्न है |

तो कृपया कर मुझे नवरात्र वक्त से प्रसन्न होती है उस विधि को और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें इस प्रकार ब्राह्मणी के कहे वचन सुनकर दुर्गा कहने लगी कि यह ब्राह्मणी मैं तुम्हारे लिए संपूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र विधि को बताती हूं जिसको सुनने से तमाम पापों से छूट कर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है आसीवन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर 9 दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें |नवरात्री व्रत कथा(Navratri Vrat Katha)

यदि दिनभर का व्रत न कर सके तो एक समय भोजन करें पढ़े-लिखे ब्राह्मणों से पूछ कर घटस्थापना और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सीखे महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती इन की मूर्तियां बनाकर उसको नित्य विधि से पूजा करें और पुष्पों से विधि पूर्वक आरध्य दे बिजोरा के फूल से अर्ध्य देने से रूप की प्राप्ति होती है और जायफल से कीर्ति और दाग से कार्य की सिद्धि होती है आंवले से सुख और केले से भूषण की प्राप्ति होती है |

इस प्रकार फलों से यह अर्ध है देने से यथा विधि हवन करें खांड घी गेहूं शहद जो तिल बिलब नारियल दाख और कदंब इनसे हवन करें गेहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है फिर से चंपा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज और सुख की प्राप्ति होती है आंवले से प्रीति और केले से पुत्र प्राप्त होता है कमल से राज सम्मान और दाखो से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है |
ज्वाला जी की कथा

खांड घी नारियल शहद जो और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है वर्क करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यंत नम्रता के साथ प्रणाम करें और यज्ञ की विधि के लिए उसे दक्षिणा दें इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं |

इसमें तनिक भी संशय नहीं 9 दिनों जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना फल मिलता है इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेध यज्ञ की प्राप्ति का फल मिलता है हे ब्राह्मणी यह संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम वक्त को तीर्थ मंदिर अथवा घर में ही विधि पूर्वक करे ब्रह्मा जी बोले हे बृहस्पति इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अंतर्ध्यान हो गई जो पुरुष या स्त्री किस वर्ष को भक्ति पूर्वक करता है |(Navratri Vrat Katha)

वह इस लोक में सुख पाकर अंत में दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होता है यह बृहस्पति यह दुर्लभ व्रत का महत्व मैंने तुम्हारे लिए सुनाया है ऐसा ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आनंद के साथ रोमांचित हो गई और ब्रह्मा जी से कहने लगे कि हे ब्रह्मा आपने मुझ पर अति कृपया की है जो अमृत के समान इस नवरात्र व्रत का महत्व में सुनाया है हे प्रभु आपके बिना इस महातम में को कौन सुना सकता है ऐसे बृहस्पति जी के भजन सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि है बृहस्पति तुमने सर्व प्राणियों के हित करने वाले इस अलौकिक व्रत को पूछा इसलिए तुम धन्य हो इस भगवती शक्ति संपूर्ण लोकों की पालना करने वाली है इस महादेवी के प्रभाव को कौन नहीं जान सकता वह सांचे दरबार की जय हो |

Shiv Navratri

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