अहोई(Ahoi Katha) अष्टमी की कथा

Ahoi Katha (अहोई अष्टमी की कथा)

अहोई(Ahoi Katha) अष्टमी की कथा


(Ahoi Katha)-एक नगर में एक साहूकार रहता था |उसके साथ लड़के थे एक दिन उसकी स्त्री खदानें में मिट्टी खोदने के लिए गई और जो कि उसने जाकर वहां कुदाली मारी और सेह के बच्चे कुदाल की चोट से सदा के लिए सो गए इसके बाद उसने कुदाल को श्याऊ के खून से सना देखा तो उसे सेह के बच्चे मर जाने का बड़ा दुख हुआ परंतु वह विवश थी क्योंकि यह काम उससे अनजाने में हो गया था |

अहोई(Ahoi Katha) अष्टमी की कथा


(Ahoi Katha)-इसके बाद वह बिना मिट्टी लिए ही खेद करती हुई अपने घर आ गई और उधर जब सेह अपने घरकाल में आई तो अपने बच्चों को मरा हुआ देखकर नाना प्रकार से विलाप करने लगी और ईश्वर से प्रार्थना की जिसने मेरे बच्चों को मारा है उसे भी इसी प्रकार से कष्ट होना चाहिए तत्पश्चात सेह के श्राप से सेठानी के साथ दो लड़के एक ही साल के अंदर समाप्त हो गए अर्थात मर गए इस प्रकार अपने बच्चों को असमय काल के मुंह में समाए जाने पर सेठ सेठानी इतने दुखी हुए कि उन्होंने किसी तीर्थ पर जाकर अपने प्राण गवा देना उचित समझा |

(Ahoi Katha)-इसके बाद में वे घर छोड़कर पैदल ही किसी तीर्थ की ओर चल दिए और खाने की और कोई ध्यान न देकर जब तक उन्हें कुछ भी शक्ति और साहस रहा तब तक वे ही रहे और जब वे पूर्णतया है आ सख्त हो गए तो अंत में मूर्छित होकर गिर पड़े उनकी ऐसी दशा देखकर भगवान करुणा सागर ने उनको मृत्यु से बचाने के लिए उनके पापों का अंत किया और इसी अवसर में आकाशवाणी हुई कि थे |

(Ahoi Katha)-सेठ तेरी सेठानी ने मिट्टी खोदते समय ध्यान न देकर सेह के बच्चों को मार दिया इसके कारण तुम्हें अपने बच्चों को खोना पड़ा यदि आप पुनः घर जाकर तो मन लगाकर गऊ की सेवा करोगे और अहोई माता अजकता देवी का विधि विधान से व्रत आरंभ कर प्राणियों पर दया रखते हुए स्वपन में भी किसी भी जीव को कष्ट नहीं दोगे तो तुम्हें भगवान की कृपा से उन्हें संतान का सुख प्राप्त होगा इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर सेठ सेठानी कुछ आशान्वित होकर और भगवती देवी का समरण करते हुए घर को चले आए |

(Ahoi Katha)-इसके बाद श्रद्धा भक्ति से न केवल अहोई माता का व्रत अपितु गऊ माता की सेवा करना भी उन्होंने आरंभ कर दिया तथा जीवो पर दया भाव रखते हुए क्रोध और द्वेष का स्वतथा था परित्याग कर दिया ऐसे करने के पश्चात भगवान की कृपा से वह सेठ सेठानी सातों पुत्रों वाले होकर अन गणित पुत्रों सहित संसार में नाना प्रकार के सुखों को भोग कर स्वर्ग चले गए बहुत सोच-विचार के बाद भली प्रकार निरीक्षण करने पर ही कार्य का आरंभ करो और अनजाने में भी किसी प्राणी की हिंसा मत करो गौ माता की सेवा के साथ-साथ होई माता की भी पूजा करो ऐसा करने पर अवश्य संतान के सुख के साथ-साथ संपत्ति सुख प्राप्त होगा|

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(Ahoi Katha)-एक साहूकार था जिसके साथ पुत्र थे 7 बहुए थी तथा एक बेटी थी दिवाली से पहले कार्तिक बदी अष्टमी को 7 ओवर हुए अपनी इकलौती ननद के साथ जंगल में खदान में मिट्टी खोद रही थी |वही श्याऊ की मांद थी मिट्टी खोदते समय ननंद के हाथ से सेह का बच्चा मर गया श्याम माता बोली कि मैं तेरी कोख बांध दूंगी तब ननंद अपनी सातों भाभियों से बोली कि तुम मेरे बदले कोई अपनी कोख बंधवा लो सब भाभी यो ने अपनी कोख बंधवाने से इनकार कर दिया |

परंतु छोटी भाभी सोचने लगी कि यदि मैं कोख नहीं बंधवाऊगी तू सासू जी नाराज होंगे ऐसा विचार कर ननंद के बदले में छोटी भाभी ने अपनी कोख बंधवा ली इसके बाद जब उससे जो लड़का होता तो 7 दिन बाद मर जाता एक दिन उसने पंडित को बुलाकर पूछा मेरी संतान सातवें दिन क्यों मर जाती है तब पंडित जी ने कहा कि तुम सुराही गाय की पूजा करो सो रही गाय श्याऊ माता की भायली हैं |

वह तेरी कोख छोड़े तब तेरा बच्चा जिएगा इसके बाद वह बहू प्रातकाल उठकर चुपचाप सो रही गाय के नीचे सफाई आदि कर जाती गौ माता बोली कि आजकल कौन मेरी सेवा कर रहा है सो आज देखूंगी गौमाता को तड़के उठी क्या देखती है,की एक साहूकार की बहू उसके नीचे सफाई आदि कर रही है |

(Ahoi Katha)-गौमाता उससे बोली मैं तेरी सेवा से प्रसन्न हूं, इच्छा अनुसार जो चाहे मांग लो तब साहूकार की बहू बोली कि शाहू माता तुम्हारी भायली हैं और उसने मेरी कोख बांध रखी है सो मेरी को खुलवा दो गौ माता ने कहा अच्छा अब तो गौ माता समुद्र पार अपने भायली के पास उसको लेकर चली रास्ते में कड़ी धूप थी सो वे दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गई थोड़ी देर में एक सांप आया और उसी पेड़ पर गरुड़ पंखी नी का बच्चा था |

(Ahoi Katha)-सांप उसको डसने ने लगा तब साहूकार की बहू ने सांप मार कर डॉल के नीचे दबा दिया और बच्चों को बचा लिया थोड़ी देर में गरुड़ पंख नहीं आई तो वहां खून पड़ा था देखकर साहूकार की बहू के चोच मारने लगी तब साहूकार ने बोली कि मैंने तेरे बच्चे को नहीं मारा बल्कि सांप से तेरे बच्चे को डसने से बचाया है मैंने तो उससे तेरे बच्चे की रक्षा की है गरुड़ पंचमी बोली की मांग तू क्या मांगती है |

(Ahoi Katha)-वह बोली सात समुंदर पार शाहू माता रहती है हमें तू उसके पास पहुंचा दें तब गरुड़ पंख ने नहीं दोनों को अपनी पीठ पर बैठाकर शाहू माता के पास पहुंचा दिया शाहू माता उन्हें देख कर बोली कि आप बहन बहुत दिनों में आई है फिर कहने लगी कि बहन मेरे सिर में जुएं पड़ गई है तब सुरई के कहने पर साहूकार की बहू ने सलाई से उनकी जुए निकाल दी इस पर शाहू माता बहुत प्रसन्न हो बोली कि तूने मेरे सिर में बहुत सलाई डाली है इसलिए तेरे साथ बेटे और बहू होगी वह बोली मेरे तो एक भी बेटा नहीं सात बेटे कहां से होंगे शाहू माता बोली वचन दिया है |

वचन से फिरू तो धोबी के कुंड पर कंकरी होऊ जब साहूकार की बहू बोली मेरी कोख तो तुम्हारे पास बंद ही पड़ी है यह सुन शाहू माता बोली कि तूने मुझे ठग लिया मैं तेरी को खोलती तो नहीं परंतु अब खोलनी पड़ेगी जो तेरे घर तुझे सात बेटे और सात बहुए मिलेगी तू जा कर उज मन करियो सात अहोई बनाकर साथ कड़ाई करियो|
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(Ahoi Katha)-वह लौटकर घर आई तो देखा सात बेटे सात बहू है बैठे हैं वह खुश हो गई उसने साथ अहोई बनाई सात उज्मन किए तथा साथ कढ़ाई की रात्रि के समय जेठानी आपस में कहने लगी कि जल्दी जल्दी नहा कर पूजा कर लो कहीं छोटी बच्चों को याद करके रोने लगे थोड़ी देर में उन्होंने अपने बच्चों से कहा अपनी चाची के घर जाकर देख आओ कि आज वह अभी तक रोई क्यों नहीं बच्चों ने जाकर कहा कि चाची तो कुछ मांड रही है खूब ऊजमन हो रहा है |

(Ahoi Katha)-यह सुनते ही जेठानी या दौड़ी-दौड़ी उसके घर आई और जाकर कहने लगी कि तूने कोख कैसे छुड़ाई वह बोली तुमने तो कोख बनद वाई ही नहीं सो मैंने कोख बंदा ली थी अब शाहू माता ने कृपया करके मेरी कोख खोल दी है श्याऊ माता ने जिस प्रकार उस साहूकार की बहू की को खोली उसी प्रकार हमारी भी खोलियो कहने वाले तथा सुनने वाले की तथा सब परिवार की कोख खोलियो|

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