माँ Navdurga जी का चौथा रूप – माँ कुष्माँडा

माँ Navdurga जी का चौथा रूप - माँ कुष्माँडा


माँ Navdurga जी का चौथा रूप – माँ कुष्माँडा


Navdurga हिन्दू पन्थ में माता दुर्गा ,अथवा पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है | दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अन्तर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में Navdurga के नाम दिये गए हैं |

|| श्लोक|| Navdurga मंत्र

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च Navdurga: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

माँ दुर्गा के 9 रूप होते है | इन्हें नो रूपों को Navdurga के नाम से जाना जाता है |

माँ दुर्गा जी के चौथे स्वरूप का नाम कुष्माँडा है | अपनी मंद हल्की हंसी द्वारा अंड अर्थात् ब्रह्माँड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माँडा देवी के नाम से भी जाना जाता है | जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था ,चारों ओर अंधकार ही अंधकार छाया रहता था | तब इन्हीं देवी ने अपने ईषतहास्य से ब्रह्माँड की रचना की थी | अतः यही सृष्टि की आदि स्वरूपा आदिशक्ति है |

इनके पूर्व ब्रह्माँड का अस्तित्व था ही नहीं | इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है | सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है | इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही देदीपयमान और भास्वर है | इनके तेज की तुलना इन्हीं से की जा सकती है | अन्य कोई भी देवी देवता इनके तेज और प्रभाव की क्षमता नहीं कर सकते |इन्हीं के तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही है |

ब्रह्माँड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है | इनकी आठ भुजाएं हैं , अत‌: यह अष्टभुजा देवी के नाम से भी विख्यात हैं | इनके सात हाथों में क्रमश कमंडलु धनुष बाण कमल पुष्प अमृत पूर्ण कलश चक्र तथा गदा है | आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है | इनका वाहन सिंह है , संस्कृत भाषा में कुष्माँड कुम्हडे को कहते हैं , बालियों में कुम्हेडी की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है | इस कारण से भी यह कुष्माँडा कही जाती है |

नवरात्र पूजन के चौथे दिन कूष्माँडा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है | इस दिन साधक का मन अनाहत चक्र में अवस्थित होता है | अंत इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और अचल मन से कूष्माँडा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा उपासना के कार्य में लगना चाहिए ,माँ कूष्माँडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग शोक विनाश हो जाते हैं |इनकी भक्ति से आयु यश बल और आरोग्य की वृद्धि होती है |

माँ कुष्माँडा को प्रशन करने के लिए माँ की सेवा सच्चे दिल से और सेवा भाव से की जाति है | इससे माँ की कृपा अव्स्ये प्राप्त होती है | अगर भक्त अपने पुरे मन से माँ की शरण में आता है तो उसे बहुत बड़ी साधना में मिलती है |और वह परम पद को प्राप्त होता है | हमें चाहिए कि हम शास्त्रों पुराणों में वर्णित विधि विधान के अनुसार माँ दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्ग पर यह निर्णय अग्रसर हो माँ के भक्त कुछ मार्ग पर कुछ कदम आगे बढ़ने पर भक्तों साधक को उनकी कृपा का सूक्ष्म अनुभव होने लगता है |

यह दुख स्वरूप संसार उसके लिए अत्यंत सुखद और सुगम बन जाता है | माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयष्कर मार्ग है | माँ कूष्माँडा की उपासना मनुष्य को आंधियों व्याधियों से सर्वथा विमुक्त करके उसे सुख समृद्धि उन्नति की ओर ले जाने वाली है | आपने लौकिक पारलौकिक उन्नति चाहने वालों को इनकी उपासना में सदैव तत्पर रहना चाहिए |

|| जय माता दी || 

 




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