माँ Navdurga जी का दूसरा रूप – माँ ब्रह्मचारिणी

माँ Navdurga जी का दूसरा रूप - माँ ब्रह्मचारिणी

माँ Navdurga जी का दूसरा रूप – माँ ब्रह्मचारिणी

Navdurga हिन्दू पन्थ में माता दुर्गा ,अथवा पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है | दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अन्तर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में Navdurga के नाम दिये गए हैं |

|| श्लोक|| Navdurga मंत्र

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च Navdurga: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

माँ दुर्गा के 9 रूप होते है | इन्हें नो रूपों को Navdurga के नाम से जाना जाता है |

मां Navdurga में नव शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है | यहां ब्रह्मा शब्द का अर्थ तपस्या करने वाला है |ब्रह्मचारिणी अथार्त तप की चारणी तप का आचरण करने वाली देवी |

कहा भी है वेद अस्तित्व तपो ब्रह्मा अर्थात वेद तत्व और तब ब्रह्मा शब्द के अर्थ है |ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएं हाथ में कमंडल रहता है |अपने पुनर्जन्म में जब यह हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी ,तब नारद के उपदेश से इन्होंने प्रभु भोलेनाथ जी को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी |

इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तब तपसचारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी के नाम से भी जाना जाता है | 1000 वर्ष उन्होंने केवल फल मूल खाकर व्यतीत किए थे 100 वर्षों तक केवल शाख पर निर्वाह किया था |कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे, इस कठिन तपस्या के कारण पश्चात 3000 वर्षों तक केवल जमीन पर टूट कर गिरे हुए बेलपत्र को खाकर वह अपनी भूख मिटाति रही और भगवान शंकर की आराधना करती रही|

इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्र को भी खाना छोड़ दिया था |कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रही पत्तो को भी खाना छोड़ देने के कारण देवी का एक नाम अपर्णा भी पुकारा जाता है |

कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का यह पुनर्जन्म का शरीर एकदम श्रीण हो उठा |वह अत्यंत ही कृशकाय हो गई थी उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मेना अत्यंत दुखी हो उठी’ और उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या वृत्त करने के लिए आवाज दी ( उ मां )अरे नहीं और नहीं तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्व जन्म का एक नाम उमा भी पुकारा जाता है |

उनकी इस तपस्या से तीनों लोगों में हाहाकार मच गया था |देवता ऋषि मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे| अंत में पिता ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें संबोधित करते हुए प्रशंसा के स्वरों में कहा ,की हे देवी आज तक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की है ,ऐसी तपस्या सिर्फ तुम से संभव थी |

तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चारो और सराहना हो रही है |तुम्हारी मनोकामना तो अवस्य परिपूर्ण होगी और तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी भगवान चंद्रमौली शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे | अब तुम तपस्या से वृत होकर घर लौट जाओ शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं |

मां दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है |इनकी उपासना से मनुष्य में तप त्याग वैराग्य सदाचार संयम की वृद्धि होती है जीवन के कठिन संघर्षों में भी उनका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं हो पाता है ,मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है |दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है इसी दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होता है |इस चक्र में अवस्थित वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है |

|| जय माता दी ||

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