माँ Navdurga जी का छठा रूप – माँ कात्यायनी

माँ Navdurga जी का छठा रूप – माँ कात्यायनी


माँ Navdurga जी का छठा रूप – माँ कात्यायनी

Navdurga हिन्दू पन्थ में माता दुर्गा ,अथवा पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों की विनाशिनी कहा जाता है | दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अन्तर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में Navdurga के नाम दिये गए हैं |

|| श्लोक|| Navdurga मंत्र

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च Navdurga: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

माँ दुर्गा के 9 रूप होते है | इन्हें नो रूपों को Navdurga के नाम से जाना जाता है |

माँ दुर्गा के छठवें स्वरूप का नाम कात्यायनी है |इनका कात्यायनी नाम पढ़ने की कथा इस प्रकार है ,कत नामक एक प्रसिद्ध महरिशी थे | उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए ,समस्त संसार में प्रसिद्ध महर्षि कात्यान ने इसी गोत्र कात्य में जन्म लिया था | महर्षि कात्यान ने माँ भगवती की बहुत कठिन तपस्या की थी | उनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले |

माँ भगवती महर्षि के तप से बहुत खुश हुई और देवी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली | कुछ समय बाद जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया, तब भगवान ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया | यही देवी माँ भगवती कहलाई |

महर्षि कात्यायनी सर्वप्रथम इनकी पूजा की इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाए | ऐसी भी कथा मिलती है कि यह महर्षि कात्यायन के वहां पुत्री के रूप में उत्पन्न भी हुई थी, आश्विन किशन चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी अष्टमी तथा नवमी तक 3 दिन तक इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था | माँ कात्यायनी अमोघ फल देनी है |

भगवान श्री कृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए बज्र की गोपियों ने इन्हीं की पूजा “कलंदी यमुना” के तट पर की थी | यह वज्र मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित है | इनका स्वरूप और चमकीला है , इनकी चार भुजाएं हैं | माँ का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है ,तथा नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है | इनका वाहन सिंह है ,दुर्गा पूजा के सातवें दिन इनकी स्वरूप की उपासना की जाती है | इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है | योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्व पूर्ण स्थान है | इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सब कुछ निवेदित कर देता है |

परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं | मां कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ ,धर्म ,काम ,मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है | वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है | 

उसके रोग शोक संताप भय आदि स्वर्था समाप्त हो जाते हैं | जन्म जन्मांतर के पापों की विशिष्ट करने के लिए मां की उपासना से अधिक सुगम और सरल मार्ग दूसरा नहीं है | इनका उपासक निरंतर इन के सानिध्य में रहकर परम पद का अधिकारी बन जाता है | अंत हमें हमेशा माँ के शरणागत होकर उनकी पूजा उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए |

|| जय माता दी ||

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