तू पहले दस कदम तो चल

गांव के लोग उन्हें ‘हरिया’ कहकर बुलाते थे। वे बहुत ही सरल, भोले-भाले, सरल किसान थे। गांव में उसके कुछ खेत थे। वह इन्हीं खेतों से गुजारा करता था। अपने खेतों में काम करते हुए, उन्होंने गाँव के पास की पहाड़ियों को उत्सुकता से देखा। हरियाली से आच्छादित उसकी चोटियाँ उसे उसके खेतों से ही दिखाई दे रही थीं। कई बार उनके मन में जाकर उन्हें करीब से देखने की इच्छा बहुत प्रबल हो गई, लेकिन कभी-कभी किसी न किसी कारण से बाल झड़ गए। वह वहां नहीं जा सकता था।

पिछली बार उन्हें सिर्फ इसलिए रुकना पड़ा क्योंकि उनके पास मोमबत्ती नहीं थी। वह मोमबत्ती के बिना कैसे जा सकता था? उन पहाड़ियों पर जाने के लिए रात के अंधेरे में ही निकलना पड़ता था। जब सूरज निकलता तो पहाड़ पर चढ़ना और भी मुश्किल हो जाता। सूरज की तपिश से भारतीयों को परेशानी होती थी। उनके पैर उन पर नहीं रखे जाने थे। उसके पास जूते भी नहीं थे। ऐसे में दिन में जलती पहाड़ी पगडंडियों पर नंगे पांव चलना उसके लिए और भी मुश्किल हो गया। उसने गांव के बुजुर्गों से भी सुना था कि पहाड़ों के रास्ते में प्यास बुझाने के लिए पानी का कोई जरिया नहीं है। इस मार्ग पर कोई जलप्रपात या शीशा नहीं है, जिससे प्यासे यात्री अपनी प्यास बुझा सकें।

कुल मिलाकर उस दिन का सफर मुश्किल भरा रहा। दिन में वहाँ जाते समय कई बाधाएँ और बाधाएँ आईं। रात का सफर ही आसान रास्ता था, लेकिन रात में रास्ता ढकने के लिए रोशनी की कुछ व्यवस्था की जरूरत थी। वहीं उसे परेशानी हुई। वह पिछले कई सालों से यह व्यवस्था नहीं कर पाए थे। इसमें उनकी गरीबी सबसे बड़ी बाधा थी। उसके पास ज्यादा खेती की जमीन भी नहीं थी। हर रास्ते की तरह बस चलती रही। कभी-कभी तो गाँव के मुखिया द्वारा थोड़ा सा कर्ज भी वहन किया जाता था। ऐसे में रोशनी के लिए मोमबत्तियां इकट्ठा करना उनके लिए बहुत फिजूलखर्ची थी, लेकिन पहाड़ियों की हरी-भरी चोटियां उन्हें समय-समय पर मौन निमंत्रण भेजती थीं। उन्हें देखकर दिल दहल गया। अभी कुछ दिन पहले जब वह खेतों में काम कर रहा था तब अनचाहा हुक और पतवार। उसकी तीव्र निगाहें पहाड़ों की चोटियों पर टिकी थीं। लालची निगाहों से उसे इस तरह पहाड़ों को देख कर पास खड़े मुखिया ने पूछा। मुखिया से बहुत पूछने पर वह कुछ देर रुकने से हिचकिचाते हुए अपने मन की बात कह दी। दया कर ग्राम प्रधान ने उसकी बातें सुनकर उसके लिए एक बंदी की व्यवस्था कर दी। कैदी मिलने के बाद वह पूरी रात पहाड़ों पर जाने की खुशी में सो नहीं पाया। वह रात के दो बजे उठे और पहाड़ियों के लिए निकल पड़े।

गांव के बाहर बने मंदिर के पास आकर वह कांपते हुए रुक गया। इस मंदिर में एक युवा साधु रहा करता था। वह भी इस समय अपने ख्यालों में जाग रहा था। हरिया ने उसे अपने मन की चिंताओं और दुविधाओं के बारे में बताया। अमावस्या की रात का घोर अँधेरा है। उसके पास कैदी की रोशनी दस कदम से ज्यादा नहीं है, जबकि पहाड़ को दस मील चढ़ना है। एक कैदी जो मंजिल से दस मील दूर और रोशनी के दस कदम दूर है, मामला कैसे सुलझेगा? इतने घने अँधेरे में इतने कैदियों की रोशनी में यात्रा करना कहाँ तक उचित है? यह एक छोटी डोंगी के साथ समुद्र में उतरने जैसा है।

मंदिर के युवा साधु को उसकी बात पसंद आई। उन्होंने भी हरिया की बातों में हां मिला दी। उन्हें भी कुछ ऐसी ही समस्या थी। वह स्वयं भी सोच रहा था कि गुरु द्वारा दिए गए छोटे चौबीस अक्षरों के गायत्री मंत्र की सहायता से आध्यात्मिक शिखर की यात्रा कैसे संभव होगी। आध्यात्मिक जीवन की शाश्वत यात्रा और एक छोटा सा गायत्री मंत्र, कुछ भी काम नहीं कर रहा है। साधु को भी उस किसान की चिंता सता रही थी, जब उसने देखा कि एक बूढ़ा व्यक्ति पहाड़ियों के किनारे से उसकी ओर आ रहा है। उस बूढ़े के हाथ में और भी छोटी मोमबत्ती है।

हरिया उसके पास दौड़ा और बूढ़े को रोका और उसे अपनी दुविधा बताई। हरिया की सारी बातें सुनकर बूढ़ा जोर से हंस पड़ा। उसकी दूधिया-मोटी दाढ़ी उसकी दीप्तिमान हँसी से और भी रोशन हो गई थी। हंसते हुए बूढ़े ने कहा, “पागल! आप पहले दस कदम चलते हैं। जहां तक ​​आप देख सकते हैं वहां जाओ। तब केवल यह और अधिक दिखाई देगा। दस कदम बहुत हैं। एक कदम भी देखा जा सकता है, मदद से उस से सारी भूमि की परिक्रमा की जा सकती है।बूढ़े की बातों में उसके अनुभव की झलक थी।

बूढ़ी हरिया के साथ चलते हुए वह उस मंदिर के साधु के पास पहुंचा और बिना किसी हिचकिचाहट के उससे कहने लगा, “तुम्हें इस तरह आध्यात्मिक जीवन के बारे में सोचते हुए देखकर मुझे बहुत आश्चर्य होता है। आध्यात्मिक जीवन को सोचने से नहीं, बल्कि उसकी संपूर्णता में साधना से जाना जाता है। सत्य का सामना करने का और कोई उपाय नहीं है। जागो और जीओ! जागो और चलो चलते हैं आध्यात्मिक सत्य कोई मरी हुई चीज नहीं है जिसे बैठे हुए पाया जा सके। बहुत ही जीवंत प्रवाह है। अपनी जीवन-साधना की नियमितता में जो कुछ भी स्वतंत्र रूप से और स्वतंत्र रूप से बहता है, वह उसे पाता है।

युवा साधु उसकी बातों को बहुत ध्यान से सुन रहा था। उसके निराश हृदय के अँधेरे में आशा की तेज किरणें बरस रही थीं। बूढ़ा कह रहा था, “निकट अक्सर बहुत दूर की सोच में खो जाता है, जबकि सत्य निकट है और निकट छिपा है जो दूर है। क्या दूर जाने के लिए पहले पास होना आवश्यक नहीं है? क्या सब कुछ नहीं है? भविष्य वर्तमान वर्तमान क्षण में?क्या एक छोटे से कदम में सबसे बड़ी मंजिल का घर नहीं है?

निकटता के कारण ही युवा साधु ने अब तक बूढ़े को पहचान लिया था। वे उनके दीक्षा गुरु थे। उन्होंने उन्हें गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी। जैसे ही उन्होंने युवा ऋषि को प्रणाम किया, उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, “गुरु जानता है कि शिष्य को कब क्या चाहिए? आपको जो दिया जाता है वह आपके लिए सबसे अच्छा है। गायत्री साधना नित्य धैर्य से करें। इससे आप अध्यात्म के सभी शिखरों की यात्रा कर सकेंगे। ध्यान मत करो। भ्रमित न हों, यात्रा करें।”

हरिया ने अपनी यात्रा शुरू की। युवा साधु ने अपनी गायत्री साधना की दिनचर्या में ध्यान लगाया। कुछ देर बाद दोनों अपने-अपने अनुभव के बल पर सभी को अपने-अपने तरीके से समझाने लगे, “दोस्तों! क्या बैठे हो? उठो और जाओ। जो सोचता है, वह नहीं करता; जो चलता है, वही पहुंचता है। याद रखना कि सबके पास इतनी बुद्धि है, इतनी रोशनी है कि उससे कम से कम दस कदम की दूरी देखी जा सकती है और वह भी काफी है। गायत्री मंत्र के नियमित अभ्यास का प्रकाश परमात्मा तक पहुंचता है।

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